मातृत्व को अक्सर एक तयशुदा कहानी की तरह पेश किया जाता है: जन्म, पालन-पोषण और परिवार की एक परिचित तस्वीर। लेकिन हर व्यक्ति का अनुभव ऐसा नहीं होता। कुछ लोग माता-पिता बनना नहीं चाहते, कुछ गोद लेने का रास्ता चुनते हैं, और कुछ उन रिश्तों में देखभाल करते हैं जिन्हें समाज आम तौर पर मातृत्व नहीं कहता। Café Dissensus की 69वीं अंक-श्रृंखला इसी सवाल को सामने रखती है: माँ होने का अर्थ किसे तय करने का अधिकार है?
“The Other Mothers: Imagining Motherhood Differently” नाम वाला यह अंक मातृत्व को केवल जैविक पहचान या स्त्री की अनिवार्य भूमिका मानने से इनकार करता है। इसमें संपादकीय, व्यक्तिगत अनुभव, कविता और साहित्यिक आलोचना साथ आते हैं। यह मेल उपयोगी है, क्योंकि एक ही विचार को अलग-अलग रूपों में देखने पर स्पष्ट होता है कि मातृत्व कोई सरल, सब पर लागू होने वाली परिभाषा नहीं है।
एक अंक, कई अनुभव
परमिता सेनगुप्ता का संपादकीय प्रजनन और परिवार को लेकर असहज सवाल उठाता है। जब दुनिया भर में कई बच्चों को परिवार की ज़रूरत है, तब प्रयोगशाला में अपनी पसंद के गुणों वाले बच्चे बनाने की इच्छा को कैसे समझा जाए? यह सवाल तकनीक का विरोध भर नहीं है। यह पूछता है कि जैविक समानता को इतना महत्व क्यों दिया जाता है और बच्चे की देखभाल तथा सुरक्षा को चर्चा के केंद्र में क्यों नहीं रखा जाता।
कमला भसीन का “Glimmerings of Parenthood” अलग तरह से बात करता है। वे लिखती हैं कि लंबे समय तक साथी के साथ रहने के बावजूद दोनों ने बच्चे के बारे में गंभीर बातचीत नहीं की थी। उनमें माता-पिता बनने की तीव्र इच्छा नहीं थी; कभी किसी बच्चे को देखकर यह विचार अच्छा लगता, मगर वह एहसास उनके काम और जीवन की संतुष्टि से बड़ा नहीं था। यह अनुभव उन लोगों को जगह देता है जिनके लिए संतान न होना कोई अधूरापन नहीं, बल्कि उनके जीवन की वास्तविक पसंद या परिस्थिति है।
इस अंक की कविताएँ भी शरीर और रोज़मर्रा के अनुभव पर ध्यान खींचती हैं। पॉलामी सेनगुप्ता की दो कविताओं में मेट्रो, लिफ्ट और आसपास के लोगों के बीच स्त्री होने का अनुभव दिखाई देता है। ऐसी रचनाएँ मातृत्व पर चर्चा को केवल बच्चे के जन्म तक सीमित नहीं रहने देतीं। वे उस सामाजिक वातावरण की ओर देखती हैं जिसमें स्त्री का शरीर लगातार देखा, परखा और नियंत्रित किया जाता है।
अंक का महत्व इसी विविधता में है। यहाँ कोई एक आदर्श परिवार पेश करके बाकी सबको उसके मुकाबले में नहीं आँकता। पाठक को मिलते हैं अलग जीवन, अलग उलझनें और ऐसे प्रश्न जिनके उत्तर आसान नहीं हैं। यही वजह है कि को केवल लेखों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि मातृत्व की प्रचलित धारणाओं पर बातचीत शुरू करने वाले स्वतंत्र मंच के रूप में समझना बेहतर है।
‘माँ’ भूमिका भी हो सकती है
अनुराधा मजूमदार का लेख “Musings on the ‘Other’ Mothers” इस विचार को आगे बढ़ाता है कि “माँ” को केवल संज्ञा की तरह न देखा जाए। देखभाल करना एक क्रिया भी है। इस नज़र से मातृत्व का अर्थ जन्म देने तक सीमित नहीं रहता; उसमें जिम्मेदारी, अपनापन और किसी दूसरे के लिए मौजूद रहने का काम शामिल होता है। लेख में आदित्य की कहानी का उल्लेख है, जिसे राष्ट्रीय मीडिया, विशेषकर एनडीटीवी, ने सामने रखा था। उसके संदर्भ से लेखक मातृत्व की भाषा को कम लैंगिक और अधिक खुला बनाने की जरूरत रेखांकित करती हैं।
यह बदलाव सुनने में छोटा लग सकता है, पर असर बड़ा है। जब समाज “माँ” को केवल एक खास शरीर और पारिवारिक ढाँचे से जोड़ता है, तब कई तरह की देखभाल अदृश्य हो जाती है। दूसरी ओर, मातृत्व को व्यवहार और संबंध के रूप में समझने से उन लोगों के अनुभव भी चर्चा में आ सकते हैं जो परंपरागत भूमिका में फिट नहीं बैठते। इसका मतलब यह नहीं कि जन्म देने वाली माँ का अनुभव महत्वहीन है। बात इतनी है कि वही अकेला मान्य अनुभव न बने।
बार्शा मंडल का लेख डिज़्नी की फ़िल्म “टैंगल्ड” में रॅपन्ज़ेल और गोथेल के रिश्ते को गोद लेने और अपहरण की दुविधा के ज़रिए पढ़ता है। गोथेल रॅपन्ज़ेल को “माँ” कहे जाने की स्थिति में है, लेकिन उनके संबंध में प्रेम और नियंत्रण की सीमा टूट चुकी है। रॅपन्ज़ेल का यह पूछना कि क्या उसे गोथेल को माँ कहना भी चाहिए, रिश्ते के नाम और उसके वास्तविक स्वरूप के बीच का फर्क दिखाता है। इससे पाठक सोच सकता है कि सिर्फ़ पारिवारिक संबोधन किसी संबंध को सुरक्षित या स्नेहपूर्ण नहीं बना देता।
श्रेय मुखर्जी का लेख चिमामांडा न्गोज़ी अदीची की 2020 की कहानी “ज़िकोरा” पर केंद्रित है। इसके माध्यम से वह इक्कीसवीं सदी में मातृत्व की जटिलताओं पर विचार करती हैं। महिलाओं ने जीवन के अनेक क्षेत्रों में उपलब्धियाँ हासिल की हैं, फिर भी मातृत्व से जुड़े फैसले, अपेक्षाएँ और दबाव कम नहीं हुए। कहानी को पढ़ने का यह संदर्भ दिखाता है कि आधुनिक जीवन में स्वतंत्रता और सामाजिक अपेक्षाएँ अक्सर साथ-साथ चलती हैं। www.cafedissensus.net/
पढ़ने का व्यावहारिक तरीका
अगर आप इस अंक को पढ़ना चाहते हैं, तो इसे एक ही निष्कर्ष खोजने के बजाय अलग-अलग आवाज़ें सुनने के लिए खोलें। Café Dissensus की वेबसाइट पर “About Us”, संपादकीय मंडल, घोषणाएँ, पुराने अंक, लेख भेजने की जानकारी और संपर्क जैसे हिस्से भी दिए गए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह केवल एक लेख का पन्ना नहीं, बल्कि नियमित संपादकीय काम और अलग-अलग अंकों के माध्यम से विचार प्रकाशित करने वाला मंच है। इस अंक की सामग्री को समझने के लिए आप यह क्रम आज़मा सकते हैं:
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पहले संपादकीय पढ़ें। इससे अंक का केंद्रीय सवाल और उसकी दिशा समझ में आएगी।
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फिर कमला भसीन का निजी अनुभव पढ़ें। इससे मातृत्व न चुनने या उसके बारे में अनिश्चित रहने की बात ठोस रूप में सामने आती है।
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इसके बाद कविता और रॅपन्ज़ेल पर लेख पढ़ें। दोनों दिखाते हैं कि शरीर, देखभाल और रिश्तों की भाषा साहित्य में कैसे उभरती है।
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अंत में “ज़िकोरा” और मातृत्व के दूसरे रूपों पर लेख देखें। इस तरह आप व्यक्तिगत अनुभव से साहित्यिक और सामाजिक प्रश्नों तक पहुँचेंगे।
प्रिथ्वीजित सिन्हा का “The Anatomy of Motherhood” मातृत्व के अंधेरे पहलुओं से भी मुँह नहीं मोड़ता। लेख प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु, बच्चे के पालन-पोषण में स्त्री की भूमिका को सीमित कर देने और अपने शरीर पर नियंत्रण की कमी जैसी समस्याओं का उल्लेख करता है। यह दृष्टि जरूरी है, क्योंकि मातृत्व को केवल त्याग या आनंद की पवित्र छवि में बाँध देने से जोखिम और असमानता पर बात करना कठिन हो जाता है।
चंद्रकला घोष का लेख जुँगीय आद्यरूपों के सहारे पारंपरिक माँ-बेटी संबंधों पर विचार करता है। इससे अंक का दायरा और फैलता है: मातृत्व केवल सामाजिक नीति या निजी चुनाव नहीं, बल्कि स्मृति, शोक और कल्पना से जुड़ा अनुभव भी है। यहाँ लेखकों के तरीके अलग हैं, पर साझा आग्रह साफ़ है—रिश्तों को नाम देने से पहले उनके भीतर मौजूद शक्ति, प्रेम और जिम्मेदारी को देखना चाहिए।
इसलिए Café Dissensus का यह अंक उन पाठकों के लिए खास तौर पर सार्थक है जो परिवार, गोद लेने, प्रजनन, स्त्री के शरीर या साहित्य में माँ की छवि पर सोचते हैं। यह कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाता। इसके बजाय यह पूछने की जगह बनाता है कि देखभाल किससे आती है, मातृत्व की सामाजिक कीमत कौन चुकाता है, और किन अनुभवों को अब तक किनारे रखा गया है। ऐसे सवालों के साथ पढ़ें, तो “दूसरी माँ” कोई अपवाद नहीं रहती; वह मातृत्व को अधिक ईमानदारी से समझने का रास्ता बन जाती है।